Tuesday, February 26, 2013

इक जला हुआ पन्ना!


अंकित माथुर...

रचनाकार, जी हां रचनाकार कितनी ही बार इक पन्ने पर उकेरी गई इबारतों, अभिव्यक्ति को, अपूर्ण, बेवजह, बेज़ा, बेहिस, समझ के तोड़ मरोड़ के फ़ेंक दिया करते हैं। और तुमने, तुमने तो यकीनन जला ही दिया होगा उस पन्ने को! होगा क्या जला ही दिया है शायद। ऐसा भी क्या हो गया कि उस पन्ने के राख के ढ़ेर में बदलने के बाद, ये एहसास हो रहा है तुम्हे, कि उसी पन्ने पर ही तो जीवन का सच था, सच तो छोड़ो जीवन था, कि काश इस पन्ने पे लिखे हर्फ़ों को समझ पाती मैं????
अब ऐसा भी क्या खो गया इस पन्ने पर जिसे जलाने के बाद भी तुम ढूंढ रही हो, उस पन्ने को, जिस पर जीवन’ लिखा था........ओफ़्फ़ो भूल गया मैं, पन्ने को जलाने की तो, अरे नही, जीवन को जलाने की तो पुरानी आदत थी तुम्हें। लेकिन ये जीवन अब जल चुका है। राख के सिवा क्या कुछ मिल पायेगा?
क्या उस राख को माथे का सिंदूर बना पाओगे? हा हा हा हा हा!
इस अट्टाहास में भी कोई मर्म है, हां उस जले हुये पन्ने का मर्म है? क्या उस जला दिये गये पन्ने का मर्म समझ पाओगे? शायद नही......................................

गुस्ताखी माफ़.
छपास रोग से ग्रसित, आपका अपना, (मौलिक)
अंकित माथुर 

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