हिन्दी के शब्दकोष का काफ़ी असरदार और वज़नदार शब्द है , वर्चस्व!
कल रात्रि ज़ी सिनेमा पर अर्शद वारसी और महिमा चौधरी द्वारा अभिनीत फ़िल्म "सहर" देखी,
इस फ़िल्म में पूर्वी उत्तर प्रदेश में हावी कोयले के ठेकेदारों में आपसी
वर्चस्व स्थापित करने को लेकर छिडी़ जंग को बखूबी दर्शाया गया है।
फ़िल्म देखने के बाद सोचा कि आखिर कैसी ताकत है, इस शब्द में?
हम सब भी तो कहीं ना कहीं अपना वर्चस्व स्थापित करने हेतु लगातार प्रयासरत हैं।
हम किस क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे है?
क्या हम किसी ना किसी रुप से अपना अपना वर्चस्व स्थापित नही करना चाहते?
और यदि चाहते हैं तो क्यों? पत्रकार अपने क्षेत्र में, व्यवसायी अपने क्षेत्र में,
डाक्टर अपने क्षेत्र में, उद्यमी अपने क्षेत्र में, टाटा अपने तो अंबानी अपने क्षेत्र में...
कहीं भाषा का वर्चस्व, कहीं जाति का वर्चस्व,
कहीं अपराध का वर्चस्व कहीं राजनीति का वर्चस्व,
कहीं आतंकवाद का तो कहीं शांति का वर्चस्व...
हम सभी इस वर्चस्व की लड़ाई में उलझे हुए हैं। किसी को अपना वर्चस्व स्थापित करने में
कठिनाई होती है, कोई आराम से अपने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता है।
आखिर ऐसा क्या है इस वर्चस्व में जो यह हम सभी को अपनी ओर खींच लेता है?
क्यों हम इस वर्चस्व की लड़ाई को निरन्तर लड़ते रहते हैं।
आप सभी सुधी पाठक कुछ कहना चाहेंगे? यदि हां तो अपनी टिप्पणी अवश्य छोडें..
धन्यवाद
अंकित माथुर...
http://varchassv.blogspot.com/
Monday, July 30, 2007
वर्चस्व की लड़ाई
Posted by
अंकित माथुर
at
4:50 PM
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4 comments:
बढिया है...
Kya karen bhai.. Ye kambakth cheej hi aisi hai.... Aadmi ko eak ajeeb sa ehsaas iske peeche bhagne ke liye majboor kar deta hai..
Hum hai Cyrus ... tumhare kadradaan
Don
very good ankit..thoda hindi main problem hai.baaki pad ke accha laga..nice...very nice...
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