Friday, April 15, 2011
मुद्दा हो तो कैसा हो?
Wednesday, April 13, 2011
आईये जाने लोकपाल के बारे में!
जन लोकपाल विधेयक
जन लोकपाल विधेयक भारत में प्रस्तावित भ्रष्टाचारनिरोधी विधेयक का मसौदा है। यदि इस तरह का विधेयक पारित हो जाता है तो भारत में जन लोकपाल चुनने का रास्ता साफ हो जायेगा जो चुनाव आयुक्त की तरह स्वतंत्र संस्था होगी। जन लोकपाल के पास भ्रष्ट राजनेताओं एवं नौकरशाहों पर बिना सरकार से अनुमति लिये ही अभियोग चलाने की शक्ति होगी। जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया है।
जन लोकपाल विधेयक के मुख्य बिन्दु
- इस कानून के तहत केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा।
- यह संस्था चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी।
- किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा।
- भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को 2 साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।
- भ्रष्टाचार की वजह से सरकार को जो नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसे दोषी से वसूला जाएगा।
- अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अफसर पर जुर्माना लगाएगा जो शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर मिलेगा।
- लोकपाल के सदस्यों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर करेंगी। नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।
- लोकपाल/ लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच 2 महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।
- सीवीसी, विजिलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटि-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा।
- लोकपाल को किसी भी भ्रष्ट जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए पूरी शक्ति और व्यवस्था होगी।
जन लोकपाल बिल की प्रमुख शर्तें
न्यायाधीश संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल द्वारा बनाया गया यह विधेयक लोगों द्वारा वेबसाइट पर दी गई प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया है। इस बिल को शांति भूषण, जे एम लिंग्दोह, किरण बेदी, अन्ना हजारे आदि का समर्थन प्राप्त है। इस बिल की प्रति प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक दिसम्बर को भेजा गया था।
1. इस कानून के अंतर्गत, केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा।
2. यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी। कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी की जांच की जा सकेगी
3. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई सालों तक मुकदमे लम्बित नहीं रहेंगे। किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा और भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।
4. अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जाएगा।
5. यह आम नागरिक की कैसे मदद करेगा: यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं होता, तो लोकपाल जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा।
6. अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं और उसे यह काम एक महीने के भीतर कराना होगा। आप किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं जैसे सरकारी राशन की कालाबाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग। लोकपाल को इसकी जांच एक साल के भीतर पूरी करनी होगी। सुनवाई अगले एक साल में पूरी होगी और दोषी को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।
7. क्या सरकार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाना चाहेगी? ये मुमकिन नहीं है क्योंकि लोकपाल के सदस्यों का चयन न्यायाधीशों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों द्वारा किया जाएगा न कि नेताओं द्वारा। इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से होगी।
8. अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भ्रष्ट पाए गए तो? लोकपाल / लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच अधिकतम दो महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।
9. मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा? सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (अंटी कारप्शन डिपार्टमेंट) का लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा। लोकपाल को किसी न्यायाधीश, नेता या अधिकारी के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ति और व्यवस्था भी होगी।
सरकारी बिल और जनलोकपाल बिल में मुख्य अंतर
सरकारी लोकपाल के पास भ्रष्टाचार के मामलों पर ख़ुद या आम लोगों की शिकायत पर सीधे कार्रवाई शुरु करने का अधिकार नहीं होगा. सांसदों से संबंधित मामलों में आम लोगों को अपनी शिकायतें राज्यसभा के सभापति या लोकसभा अध्यक्ष को भेजनी पड़ेंगी. वहीं प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के तहत लोकपाल ख़ुद किसी भी मामले की जांच शुरु करने का अधिकार रखता है. इसमें किसी से जांच के लिए अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति. प्रधानमंत्री, दोनो सदनों के नेता, दोनो सदनों के विपक्ष के नेता, क़ानून और गृह मंत्री होंगे. वहीं प्रस्तावित जनलोकपाल बिल में न्यायिक क्षेत्र के लोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता चयन करेंगे ।
राज्यसभा के सभापति या स्पीकर से अनुमति
सरकारी लोकपाल के पास भ्रष्टाचार के मामलों पर ख़ुद या आम लोगों की शिकायत पर सीधे कार्रवाई शुरु करने का अधिकार नहीं होगा. सांसदों से संबंधित मामलों में आम लोगों को अपनी शिकायतें राज्यसभा के सभापति या लोकसभा अध्यक्ष को भेजनी पड़ेंगी.वहीं प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के तहत लोकपाल ख़ुद किसी भी मामले की जांच शुरु करने का अधिकार रखता है. इसमें किसी से जांच के लिए अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है.सरकारी विधेयक में लोकपाल केवल परामर्श दे सकता है. वह जांच के बाद अधिकार प्राप्त संस्था के पास इस सिफ़ारिश को भेजेगा. जहां तक मंत्रीमंडल के सदस्यों का सवाल है इस पर प्रधानमंत्री फ़ैसला करेंगे. वहीं जनलोकपाल सशक्त संस्था होगी. उसके पास किसी भी सरकारी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की क्षमता होगी.सरकारी विधेयक में लोकपाल के पास पुलिस शक्ति नहीं होगी. जनलोकपाल न केवल प्राथमिकी दर्ज करा पाएगा बल्कि उसके पास पुलिस फ़ोर्स भी होगी.सरकारी विधेयक में लोकपाल केवल परामर्श दे सकता है. वह जांच के बाद अधिकार प्राप्त संस्था के पास इस सिफ़ारिश को भेजेगा. जहां तक मंत्रीमंडल के सदस्यों का सवाल है इस पर प्रधानमंत्री फ़ैसला करेंगे. वहीं जनलोकपाल सशक्त संस्था होगी. उसके पास किसी भी सरकारी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की क्षमता होगी.सरकारी विधेयक में लोकपाल के पास पुलिस शक्ति नहीं होगी. जनलोकपाल न केवल प्राथमिकी दर्ज करा पाएगा बल्कि उसके पास पुलिस फ़ोर्स भी होगी
अगर कोई शिकायत झूठी पाई जाती है तो सरकारी विधेयक में शिकायतकर्ता को जेल भी भेजा जा सकता है. लेकिन जनलोकपाल बिल में झूठी शिकायत करने वाले पर जुर्माना लगाने का प्रावधान है.
सरकारी विधेयक में लोकपाल का अधिकार क्षेत्र सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री तक सीमित रहेगा. जनलोकपाल के दायरे में प्रधानमत्री समेत नेता, अधिकारी, न्यायाधीश सभी आएँगे.
लोकपाल में तीन सदस्य होंगे जो सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे. जनलोकपाल में 10 सदस्य होंगे और इसका एक अध्यक्ष होगा. चार की क़ानूनी पृष्टभूमि होगी. बाक़ी का चयन किसी भी क्षेत्र से होगा.
सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति. प्रधानमंत्री, दोनो सदनों के नेता, दोनो सदनों के विपक्ष के नेता, क़ानून और गृह मंत्री होंगे. वहीं प्रस्तावित जनलोकपाल बिल में न्यायिक क्षेत्र के लोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता चयन करेंगे.लोकपाल की जांच पूरी होने के लिए छह महीने से लेकर एक साल का समय तय किया गया है. प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के अनुसार एक साल में जांच पूरी होनी चाहिए और अदालती कार्यवाही भी उसके एक साल में पूरी होनी चाहिए.
सरकारी लोकपाल विधेयक में नौकरशाहों और जजों के ख़िलाफ़ जांच का कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन जनलोकपाल के तहत नौकरशाहों और जजों के ख़िलाफ़ भी जांच करने का अधिकार शामिल है. भ्रष्ट अफ़सरों को लोकपाल बर्ख़ास्त कर सकेगा.
सरकारी लोकपाल विधेयक में दोषी को छह से सात महीने की सज़ा हो सकती है और धोटाले के धन को वापिस लेने का कोई प्रावधान नहीं है. वहीं जनलोकपाल बिल में कम से कम पांच साल और अधिकतम उम्र क़ैद की सज़ा हो सकती है. साथ ही धोटाले की भरपाई का भी प्रावधान है.
ऐसी स्थिति मे जिसमें लोकपाल भ्रष्ट पाया जाए, उसमें जनलोकपाल बिल में उसको पद से हटाने का प्रावधान भी है. इसी के साथ केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा सभी को जनलोकपाल का हिस्सा बनाने का प्रावधान भी है.
Thursday, March 11, 2010
चॉकलेट का इतिहास, स्वाद और स्वास्थ्य
अंकित माथुर
चॉकलेट का इतिहास, स्वाद और स्वास्थ्य
चॉकलेट का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत कब हुई और इसकी खोज किसने की इस बारे में सही-सही बता पाना तो मुश्किल है क्योंकि यह एक दिन या किसी एक व्यक्ति का परिणाम नहीं था। फिर भी अध्ययन एवं साक्ष्य बताते हैं कि सर्वप्रथम `एजटेक´ के लोगों ने खोजा था कि कोकोआ की फलियों को कूट-पीस कर तथा दूसरे मसालों के साथ मिलाकर एक स्वास्थ्यवर्धक पेय बनाया जा सकता है।
सन् 1519 में स्पेन के प्रसिद्ध अन्वेषक हरनान्डो कोटेZस को मेिक्सको के शासक मोन्टेजुमा के दरबार में यह विशेष पेय परोसा गया। उन्होंने स्पेन को इसके स्वाद से अवगत कराया। मीठे व सुगंधित पदार्थ, दालचीनी, वनिला आदि मिलाकर गर्मागर्म पीये जाने वाले इस पेय की विधि को स्पेन ने सैकड़ों वषोZं तक गोपनीय रखा। फिर इसके बारे में फ्रांस तथा धीरे-धीरे यूरोप के अन्य देश भी जान गए और इसका स्वाद बढ़ाते हुए उपभोग करने लगे। जिसके फलस्वरूप इसकी लोकप्रियता एक महंगे विलासिता के साधन के रूप में तेजी से बढ़ने लगी।
शुरु में चॉकलेट तरल रूप में ही रही, परन्तु 18 वीं सदी के प्रथम दशक में `मॉिल्डंग´ तकनीक की खोज के बाद ठोस चॉकलेट प्रसिद्ध होने लगी। मशीनों में कूटी-पीसी गई कोको की फलियों से महीन चूर्ण बनाकर उसे गर्म किया जाता और सांचों में ढाल कर चॉकलेट बनायी जाती। अमेरिका में 1765 को डोरचेस्टर (मैसाचुसेट्स) के निकट `मिल्टन लोअर मिल्स´ में पहली बार चॉकलेट का निर्माण किया गया। सन् 1825 में डचमैन कोनराड वान हूटेन ने `कोकोआ बटर´ तैयार करने की शुरुआत कर दी। कोकोआ बटर करीब 97 डिग्री फैरेनहाइट के तापमान पर पिघलने लगता है जोकि मानव शरीर का सामान्य तापमान होता है। यही कारण है कि चॉकलेट मुंह में जाकर पिघलने लगती है।
सन् 1875 में स्विट्जरलैण्ड के डैनियल पीटर ने `मिल्क चॉकलेट´ की शुरुआत की जो पहले से चली आ रही `डॉर्क चॉकलेट´ की तुलना में अधिक स्वादिष्ट, मीठी व चिकनी थी। फिर तो चॉकलेट का जादूभरा स्वाद सबकी जबान पर चढ़ गया और नयी-नयी कंपनियां इस क्षेत्र में आने लगी। सन् 1905 में `कैडब्रिज´ की `डेरी मिल्क´ सर्वाधिक प्रसिद्ध चॉकलेट बन गई। वर्तमान में मिल्क चॉकलेट के ही सर्वाधिक उत्पाद बिकते व पसन्द किये जाते हैं। आज हालत यह है कि चॉकलेट का प्रयोग बिस्किट, कैण्डी, ब्रेड और मिठाई आदि कई अन्य उत्पादों में भी किया जाने लगा है।
वैसे तो कमोबेश लगभग प्रत्येक देश में ही चॉकलेट खायी व सराही जाती है, लेकिन फिर भी चॉकलेट के प्रति ब्रिटेनवासियों की दीवानगी इस हद तक पहुंच चुकी है कि पूरे यूरोप में सबसे अधिक चॉकलेट का उपभोग ब्रिटेन के लोग ही करते हैं। भोजन और पेय से सम्बंधित मार्केट ट्रेण्ड का विश्लेषण करने वाली एक कंपनी के अनुसार ब्रिटेन में एक व्यक्ति एक साल में औसतन 11.2 किलोग्राम चॉकलेट खाता है। यूरोप के अन्य देशों में दूसरे स्थान पर बेिल्जयम है जहां यह मात्रा 8.4 किलोग्राम है। अमेरिका में यह दर 5.3 किलोग्राम है।
स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है चॉकलेट
सामान्यत: चॉकलेट में प्रोटीन, वसा, विटामिन ई, कैल्सियम, फास्फोरस, मैग्निशियम और लोहा आदि जैसे खनिज तत्व होते हैं। वैसे तो इसमें 300 से भी अधिक रासायनिक तत्व होते हैं, लेकिन अभी इन सभी के बारे में ज्ञात नहीं हो सका है कि इनका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसके निर्माण में प्रयुक्त होने वाली कोकोआ में ही 20 प्रतिशत प्रोटीन, 40 प्रतिशत काबोहाइड्रेट और 40 प्रतिशत वसा होता है।
इसमें उपस्थित `थिओब्रोमाइन´ की प्रकृति `कैफीन´ से मिलती है। ग्रीक शब्द `थिओब्रोमा´ का अर्थ होता है `देवताओं का भोजन´। प्राचीन एजटेक कोको वृक्ष के बीजों का प्रयोग मुद्रा के रूप में किया करते थे। वे इस वृक्ष को शक्ति व समृद्धिदायक मानते थे। आधुनिक शोध भी बताते हैं कि चॉकलेट स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी हो सकती है। चॉकलेट खाने से शरीर में दर्द का अहसास कम करा कर प्रसन्नता का अनुभव कराने वाला हार्मोन `एण्डोफिZन´ उत्सर्जित होने लगता है जोकि तनाव आदि की स्थिति में भी हमारे शरीर में प्राकृतिक दर्द निवारक का काम करता है। इसके अलावा बहुत-से अन्य रोगों में भी चॉकलेट लाभ पहुंचाता है।
हृदय रोग में सहायक
कैलेफोनिZया के वैज्ञानिक प्रो. कार्ल कीन और उनके सहयोगियों का सुझाव है कि चॉकलेट हृदय रोग से लड़ने में भी सहायक हो सकती है। उनका कहना है कि चॉकलेट में ऑक्सीकरणरोधी `फ्लेवोनॉयड´ होता है जोकि रक्त को पतला बना कर धमनियों में उसके थक्के बनने से रोकता है। जिससे हृदयाघात की आशंका कम हो जाती है।
रक्तचाप में लाभ
चॉकलेट के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के सन्दर्भ में किए गए कुछ अध्ययन बताते हैं कि गहरे रंगों वाली चॉकलेट खाने से स्वस्थ लोगों के रक्तचाप में कमी आती है और इंसुलिन के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि गहरे रंग की चॉकलेट में बड़ी मात्रा में मौजूद फ्लेवोनॉयड अपने एंटी ऑक्सीडेंट गुणों की वजह से धमनियों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि गहरे रंग की चॉकलेट धमनियों के फैलने की क्षमता को बढ़ाती है और `प्लेटलेट´ के जमाव को कम कर देती है।
खांसी में मददगार
लम्बे समय से खांसी की परेशानी झेलने वाले लोगों के लिए आसान इलाज। चॉकलेट खाइए, खांसी दूर भगाइए। लन्दन के चिकित्सा शोधकर्ताओं ने कोको में मिलने वाले थियोब्रोमाइन तत्व से भरपूर ऐसी चॉकलेट तैयार की है जिसके सेवन से पुरानी खांसी से छुटकारा पाया जा सकता है। `इंपीरियल कॉलेज ऑफ लन्दन´ के शोधकर्ताओं ने अनेक लोगों पर परीक्षण करते हुए अपने शोध में पता लगाया है कि थियोब्रोमाइन खांसी से राहत दिलाने में विशेष समझे जाने वाले `कोडीन´ से भी 3 गुना अधिक प्रभावशाली होता है।
अतिसार का उपचार
हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला है कि अतिसार या दस्त की परेशानी से निजात दिलाने में भी चॉकलेट का सेवन बहुत कारगर होता है। दरअसल, चॉकलेट में उपस्थित फ्लेवोनॉयड अतिसार की रोकथाम में उल्लेखनीय कार्य करता है तथा चॉकलेट बनाने के लिए प्रयुक्त होने वाली कोकोआ की फलियां इस स्वास्थ्यवर्धक फ्लेवोनॉयड से भरपूर होती हैं। ऑकलैण्ड स्थित `चिल्ड्रन्स हॉिस्पटल एण्ड रिसर्च सेंटर´ के शोध दल ने चॉकलेट में पाए जाने वाले फ्लेवोनॉयड तथा आन्तों पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का अध्ययन करते हुए पाया है कि कोकोआ में उपस्थित फ्लेवोनॉयड अतिसार में भी असरदार भूमिका निभाता है। माना जा रहा है कि इस खोज से अतिसार के उपचार हेतू और भी अच्छी औषधियों के निर्माण में सहायता मिले सकेगी।
सुन्दरता के लिए चॉकलेट की मसाज
सुन्दरता बढ़ाने के लिए चॉकलेट के प्रयोग की बात खासतौर पर महिलाओं को बहुत खुश कर देगी। फ्रांस की राजधानी पेरिस के ब्यूटी पार्लरों में सुन्दरता के लिए चॉकलेट की मसाज (मालिश) की जाती है। यहां के कुछ थैरेपिस्टों का मानना है कि चॉकलेट में `एंटी एजिंग´ कारक होते हैं जिनसे चेहरे की झुरियां कम हो जाती हैं और इसके साथ-साथ शरीर में चुस्ती-फूर्ति भी आती है। चॉकलेट मसाज करने-कराने वाले लोगों का मानना है कि इससे शरीर के सभी अंगों को आराम मिलता है और दिनभर ताजगी भी रहती है। इस मसाज के लिए चॉकलेट के टब में डुबकी लगानी पड़ती है और ऐसी चॉकलेटी मसाज के दो घंटे के एक पैकेज के लिए 200 पौण्ड की फीस देनी पड़ती है। इस पैकेज में खाने के लिए चॉकलेट भी परोसा जाता है।
यह भी ध्यान रखें
कुछ लोगों का मानना है कि चॉकलेट खाने से दान्त खराब हो जाते हैं या मोटापा बढ़ता है, किन्तु कभी-कभार चॉकलेट खाने से ऐसा कुछ नहीं होता। सच्चाई तो यह है कि अति हर चीज की बुरी होती है। यदि किसी भी चीज का प्रयोग सही व सन्तुलित ढंग से न किया जाए, तो उसके परिणाम हानिकारक भी हो सकते हैं। यही बात चॉकलेट पर भी लागू होती है।
चॉकलेट का शौक रखने वाले लोगों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि वे जिस चॉकलेट का मजा ले रहे हैं वह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पूरी तरह से सुरक्षित हो क्योंकि निम्न कोटि की चॉकलेट स्वाद तो दे देती है, लेकिन उसमें जिन पदार्थों का उपयोग किया जा रहा होता है वे हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करने लगते हैं। अत: चॉकलेट या किसी भी चीज का सेवन करने से पूर्व जांच लें कि उसमें प्रयुक्त होने वाले सभी रसायन व रंगादि मानक स्तर के हों।
चॉकलेट में पाए जाने वाले कुछ पदार्थ इसकी `लत´ डालने वाले सन्दिग्ध पदार्थों के रूप में देखे जाते हैं। यही कारण है कि लगातार चॉकलेट खाने की आदत के लक्षण किसी `लत´ की तरह हो सकते हैं। इसमें मन-मस्तिष्क को `प्रसन्न´ करने वाले कुछ इस प्रकार के तत्व होते हैं जोकि `ड्रग्स´ में भी पाए जाते हैं।
Tuesday, January 19, 2010
हंगामा....
Thursday, July 30, 2009
अमेरिकी कर्ज़ और ग़ालिब का फ़लसफ़ा
अमेरिकी जीवन में एक रोचक संबंध बड़ा आम दिखाई देता है- 'लिव-इन रिलेशनशिप'। यह लिव-इन रिलेशनशिप कुछ और नहीं, उधार की शादी है। बड़ा आजाद संबंध है, जैसे ओपन इकॉनमी। जिस दिन लगे कि अब ज़िंदगी का बाकी उधार इस साथी के साथ नहीं चुकाना, तो उठाओ सूटकेस और खिसक लो। इस उधार की शादी में जो बच्चे पैदा हो जाएं, वे जिसके गले में पड़े रह जाएं, वही उनसे निपटे ब्याज की तरह।
हिंदुस्तान में एक कहावत चला करती थी- 'उधार प्रेम की कैंची है'। अमेरिका में उधार संबंध की पहचान बन गया। कौन था जिस पर किसी का कर्ज नहीं था। यहां बात एहसानों के कर्ज की नहीं, डॉलर के कर्ज की हो रही है। संबंध डॉलरों में बनने लगे। प्रेम डॉलरों में बरसने लगा - 'तुम उधार ले कर जितना खर्च करोगे, तुम्हारी प्रेमिका तुमसे उतना ही प्रेम करेगी। तुम उसे फूल दोगे, वह मुस्कराएगी। तुम उसे डिनर पर ले जाओगे, वह तुम्हारा चुंबन लेगी। तुम उसे हीरे का ब्रेसलेट दोगे, तो वह तुमसे शादी भले ही न करे, लेकिन शादी की कमी महसूस नहीं होने देगी।'
ग़ालिब कर्ज की मय पीते थे। शराब का सीधा संबंध उनके मूड से था। शायरी के मूड से। अमेरिका में कर्ज का सीधा संबंध मूड से ही है। बाजार के मूड से। ग़ालिब के कर्ज का फंडा सीधा सादा था : उधार लो और शराब पीओ। अमेरिका का फंडा भी सीधा सादा है : ग्राहक को कर्ज देकर ही वह माल खरीदेगा। ज्यादा कर्ज दो, वह ज्यादा माल खरीदेगा। ज्यादा माल बिकेगा तभी बाजार पनपेगा। बाजार पनपेगा तो अमेरिका पनपेगा।
कितना सरल फलसफा है - ग्राहक को उधार लेने के लिए उकसाओ। हर हालत में उधार दो। जरूरत हो तो उधार लेकर उधार दो। लोग कर्ज ले रहे थे। जिसे देखो वही कर्ज ले रहा था। बाजार बड़ा होता जा रहा था। समृद्धि के महल खड़े हो रहे थे। महल के खंभे मोटे और मजबूत दिखते थे। गुंबद बड़े शानदार थे।
लेकिन, अमेरिकी महल की पूरी नींव कर्ज पर टिकी थी। कर्ज की नींव पर खड़े महल को गिराने के लिए किसी भूकंप की जरूरत नहीं होती। बस, जरा सी मिट्टी खिसकना ही काफी होता है। कर्जदारों की इस लंबी श्रृंखला में बस किसी एक कड़ी के टूटने की देर थी। एक कमजोर कड़ी टूटी नहीं कि अमेरिकी मोतियों की माला बिखर गई।
ग़ालिब कर्ज लेते थे, शराब पीने के लिए। लोग उन्हें कर्ज दे भी देते थे। सब जानते हैं कि जो आदमी कर्ज लेकर शराब पीता है, वह कभी उधार चुका नहीं सकता। फिर भी लोग ग़ालिब को कर्ज देते थे। क्योंकि ग़ालिब में एक बहुत बड़ी खूबी थी कि वे शायरी लाजवाब करते थे। कर्ज देने वाले सोचते होंगे, 'ठीक है भई, ब्याज नहीं देता तो क्या हुआ, शेर तो बढ़िया कहता है। पैसे नहीं लौटाता, पर मन तो खुश कर देता है।'
क्या अमेरिकी बाजार ने कभी किसी का मन खुश किया? मन तो क्या खुश करता, अब सबका जीना जरूर दूभर कर रहा है। मेरे खयाल से ग़ालिब को उधार देना समाज की जिम्मेदारी थी, क्योंकि ग़ालिब संस्कृति को पोस रहे थे। संस्कृति को पोसने वालों के पास पैसों की कमी तो रहती है। वे पैसे भले ही उधार लेते हों, लेकिन इंसानियत के ऊपर एक बहुत बड़ा कर्ज छोड़ जाते हैं- सांस्कृतिक चेतना का कर्ज। ग़ालिब ने कहा था- 'कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हां, रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।'
ग़ालिब की फाकामस्ती से उपजा रंग तो आज तक चमचमा रहा है, जबकि अमेरिकी बाजार का कर्ज अब फाका करवाने की सोच रहा है
Tuesday, November 18, 2008
Friday, October 24, 2008
सुशील प्रकरण : वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन
इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।
दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।
बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।
भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।
विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''
लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।
बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।
बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।-------------------अगर आप भी कोई ब्लाग या वेबसाइट या वेब पोर्टल चलाते हैं और वेब पत्रकार संघर्ष समिति में शामिल होना चाहते हैं तो aloktomar@hotmail.com पर मेल करें। वेब माध्यमों से जुड़े लोगों का एक संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। आप सबकी भागीदारी का आह्वान है।