कहीं इक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत बहुत भोली भाली
मुझे अपने ख्वाबों की बाहों में पाकर
कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद में करवटें बदलकर
सरहाने से तकिया गिराती तो होगी
वही ख्वाब दिन की खामोशी में आकर
उसे मन ही मन में लुभाते तो होंगे
कई साज़ सीने की खामोशियों में
मेरी याद से झनझनाते तो होंगे
वो बेसाख्ता धीमे-धीमे सुरों में
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी
मुझे कुछ लिखने वो बैठी तो होगी
मगर उंगलियां कंपकंपाती तो होंगी
क़लम हाथ से छूट जाता तो होगा
क़लम फिर से वो उठाती तो होगी
मेरा नाम अपनी निगाहों में लिखकर
वो दांतों में उंगली दबाती तो होगी
जुबां से कभी उफ्फ निकलती तो होगी
बदन धीमे-धीमे सुलगता तो होगा
कहीं के कहीं पांव पड़ते तो होंगे
ज़मीं पर दुपट्टा लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बनाती तो होगी
कहीं एक मासूम, नाज़ुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत मगर भोली भाली
......................................... रियाज़
Tuesday, August 7, 2007
एक ग़ज़ल
Posted by
रियाज़ हाशमी
at
9:03 PM
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2 comments:
रियाज़ भाई, मेरे खयाल से जिस तेज़ी से
आपकी रचनात्मक प्रतिभा सामने आ रही है
मुझे लगता है कि वो दिन दूर नही
जब आपकी रचनाओं की किताब बाज़ार में नज़र
आने लगेगी।
बहुत बढ़िया लिखा है, जवाब नही...
अंकित माथुर...
आज पहली बार आपके चिट्ठे पर आया एवं आपकी रचनाओं का अस्वादन किया. आप अच्छा लिखते हैं, लेकिन आपकी पोस्टिंग में बहुत समय का अंतराल है. सफल ब्लागिंग के लिये यह जरूरी है कि आप हफ्ते में कम से कम 3 पोस्टिंग करें. अधिकतर सफल चिट्ठाकार हफ्ते में 5 से अधिक पोस्ट करते हैं -- शास्त्री जे सी फिलिप
मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार !!
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